Tuesday, June 9, 2009

अंधराष्ट्रवादी हूँ मैं

आज ब्लोग्वानी पर एक लेख का शीर्षक देख कर आँखें रुक गई "देश की सेना ,देश के खिलाफ"(">http://andarkeebaat.blogspot.com/2009/06/blog-post_09.html)। शीर्षक और लेख दोनों ही देख कर मन रोष से भर उठा ,टिपण्णी कर दी पर दिल फिर भी शांत नही हुआ सो लिखने बैठ गई ।


देश की सेना का देश के खिलाफ होने आरोप लगाया गया है तो यही कहना चाहती हूँ की जब सेना देश के ख़िलाफ़ काम करती है तो पाकिस्तान बनता है , भारत नहीं। यदि सेना कश्मीर में एक लघु पाकिस्तान बनानेमें एक अवरोध के समान खड़ी है तो सेना देश की खिलाफत नहीं देश के प्रति अपना कर्तव्य पूरा कर रही है । इस देश को बनाने के लिए बहुत से शहीदों ने अपने खून से इस मिटटी को सींचा है । अपने प्राणों से देश की रक्षा की है । देश ने इन कुर्बानियों को कितना याद रखा इस पर में जितना कम बोलूं अच्छा है क्यूंकि दिल दर्द से भर उठता है और जब तक ऐसे लेख लिखें जायेंगे मुझे ज्यादा कुछ उम्मीद भी नहीं है । आम जनता को फौज में जाना बेवकूफी लगती है ,बुद्धिजीवियों को सेना मानवाधिकारों की कातिल लगती है , राजनेताओं को सेना की जायज़ मांगों से विद्रोह की बू आती है । देश पर मर मिटना सैनिकों की नौकरी है उस पर इतना शोर शराबा क्यों ..मिल जाएगा एक मैडल । मत बेचारे डाल नहीं पाते इसलिए राजनैतिक समीकरणों पर ख़ास फर्क नहीं पड़ता यही कारण है कि युवाओं के "नेता" आज तक किसी युवा सैनिक का दुःख दर्द पूछने कहीं नहीं गए। काफ़ी कैमरे आसपास थे इसलिए किसी झोपडी का उनके सोने से उद्धार हो गया ,हजारों फीट की किसी सैनिक पोस्ट तो इस बात में भी मात खा गई ।


हाँ तो मैं लेख की बात कर रही थी । वहां प्रश्न उठाया गया की उस सेना की जय जय कार क्यूँ हो जो कश्मीर के हर युवा में आतंकवादी और हर घर को उनकी पनाहगार समझती हो । एक समय था जब पंजाब हिंसा और आतंक के साए में था पर आज उसका नामों निशाँ तक नहीं है और उसका कारण है उस हिंसा की विरूद्व एक जुट होने की वहां के लोगों की इच्छा शक्ति । शायद मेरा यह कहना कुछ लोगों को कड़वा लगे पर कश्मीर के हालात के लिए सेना नहीं ख़ुद वहां के लोग जिम्मेदार हैं । ऐसा लगता है कोई हल नहीं चाहता ,हुर्रियत जब मुंह खोलती है पाकिस्तान की बात करती है , आवाम की उन्हें पुरी शह मिलती है और फिर सवाल यह की एक आम कश्मीरी शक के घेरे में क्यों आता है । कहा गया कि सेना अपने ही नागरिकों पर बन्दूक ताने खड़ी है तो जरा पूछिये वहां जा कर की जब इस देश की मिटटी पर रहते हैं तो विदेशी मुल्क की बात क्यूँ करते हैं ? आप नागरिक नागरिक चिल्ला रहें हैं पहले यह तो पूछिये क्या वह ख़ुद को इस देश का नागरिक मानते हैं । लेख में यह भी लिखा गया कि सेना को बैरकों में वापिस भेजना एक बहुत बड़ी मांग है तो मैं यह याद दिला दूँ कि यदि ऐसा हो गया तो काफ़ी लोग दिल्ली के अपने वातानुकूलित कमरों में बैठ कर सेना पर आक्षेप लगाते हुए लेख नहीं लिख पाएंगे । आज़ादी की साँस और रात की सुकून कि नींद का आप इसलिए आनंद उठा पा रहे हैं क्योंकि कहीं कोई सैनिक रात को जाग रहा है। लेख में यह भी कहा गया की बन्दूक के जरिये लोगो के जीने के हक को छीना जा रहा है तो क्या यही जीने का हक कश्मीरी पंडितों और सिखों का नहीं था ? क्यूँ वह रोटी रोटी को तरस गए और सारे सपने किसी रिलीफ कैंप के टेंट में सिमट गए ?


दिन रात अपनी जान बाजी पर लगाते हुए सैनिक इस देश कि प्रभुता और अखंडता को बचाने की कोशिश कर रहें हैं उन्हें देश के खिलाफ बताया जा रहा है । कैसे मिलेगा इस देश में शहीदों और सेना को सम्मान जब आतंकवाद,देश विरोधी गतिविधियों और उनको सहारा देने वाले लोगों को ह्यूमन राइट्स का चोगा पहना पीड़ित बना दिया जाता है ॥और सेना को बलात्कारी,बन्दूक की भाषा बोलने वाली कहा जाता है जिसके कोई ह्यूमन राइट्स नहीं हैं।


यह सब बातें करने वाले को अंधराष्ट्रवादी करार दिया गया है ..वैसे क्या करें हम उस देश के रहने वाले हैं जहाँ गाँधी नेहरू को महिमा मंडित किया जाता है और सरदार पटेल ,आज़ाद,बोस भगत सिंह का इतिहास के पन्नो में दबा दिया गया है । हम तुष्टिकरण की नीति पर बड़े हुए हैं जो अपने हक की बात करता है उसे सेकुलरिस्म के दुश्मन के नाम से जाना जाता है । हम मांगी हुई आज़ादी देख कर बड़े हुए हैं ,क्रांति जैसे शब्द बस हमारे लिए फिल्मो के शीर्षक हैं ..जब हम १०० करोड़ भारतियों को अनदेखा कर एक विदेशी को इस देश की कमान सौंप सकते हैं तो सेना को देश का दुश्मन भी कह सकते हैं । यदि कुछ लोगों को ऐसे लेख लिख कर लगता है की वह राष्ट्रवादी है तो यकीं मानिये ख़ुद को अंधराष्ट्रवादी कहलाने में मैं ज्यादा गर्व महसूस करती हूँ ।

Monday, June 8, 2009

आओ फिर एक "दिवस" मनाएं

( ५ जून को पर्यावरण दिवस था ,साल भर कोई न कोई दिवस आता रहता है ..पर क्या औचित्य है इन दिवसों का ? क्या हम उनके संदेश को साल भर या जीवन भर अपने जीवन में निहित करने का प्रयास करते हैं ? यही प्रश्न इस रचना से उठाने की कोशिश की है ...)

आओ फिर एक "दिवस" मनाएं
पेडों को धुएँ से घोंट जायें
गाड़ी के हार्न से हाथ न हटायें
दिन भर एसी चलायें
कचरा बाहर फेंकते हुए तनिक न सकुचाएं
पान की पीक से दीवारें सड़कें रंग जायें
पर आज पर्यावरण दिवस मनाएं।
चौबीस घंटे ही की तो बात है
चलो कुछ पौध भेड़चाल में लगायें
हरी एक कमीज़ नारे के साथ पहन खड़े हो जायें
आओ फिर एक "दिवस" मनाएं

मात पिता को "ओल्ड फैशंड" बताएं
"जनरेशन गैप" कह उनके संस्कारों की खिल्ली उडाएं
"नाईट आउट" की मस्ती में माँ की चिंता भूल जायें
फिर उन्हें "इमोशनल" न होने की सलाह दे जायें
हर मांग "माँ बाप का फ़र्ज़ है" कह मनवायें
आख़िर में किसी वृधाश्रम में छोड़ आयें
पर आज मदर्स डे फादर्स डे मनाएं
चौबीस घंटे ही की तो बात है
उन्ही की जोड़ी कमाई से "आर्चीज़" से एक कार्ड ले आयें
भावनाओं के बाजारवाद में अपना योगदान दे आयें
आओ फिर एक "दिवस" मनाएं

देश की कमियाँ निकालने में कुछ टाइमपास कर आयें
चुनाव के दिन छुट्टी मनाएं
टैक्स भरने से ख़ुद को बचाएँ
विदेश जायें ,भले ही वहां रंग भेद के शिकार हो जायें
पर आज स्वतंत्रता दिवस या गणतंत्र दिवस मनाएं
चौबीस घंटे ही की तो बात है
टीवी पर एक दिन आने वाली देशप्रेम की फिल्मो से कुछ देशभक्ति उधार ले आयें
भले ही सचे देशभक्तों को भूल जायें
आओ फिर एक "दिवस" मनाएं

अंग्रेज़ी में बात करना "कूल" बताएं
हिन्दी देहाती होने की पहचान बताएं
अपनी माँ त्यज कर दूसरे की माँ को सर आंखों बिठाएं
महादेवी वर्मा ,प्रेम चंद हैं कौन ?
इन प्रश्नों से चौंक जायें
पर आज हिन्दी दिवस मनाएं
चौबीस घंटे ही की तो बात है
हिन्दी हिन्दी चिल्लाएं
हिन्दी महत्ता पर कुछ वाद विवाद प्रतियोगिता कराएं
आओ फिर एक "दिवस" मनाएं

औरतों को एक चीज़ मान जायें
अस्तित्व का मजाक उडाएं
काबलियत पर उनकी प्रश्नचिन्ह लगायें
औरत हो कर भी औरत को प्रताडित कर जायें
पैदा होने से पहले लड़किओं को मार आयें
पर आज महिला दिवस मनाएं
चौबीस घंटे ही की तो बात है
एक मोर्चा निकाल आयें
महिला आरक्षण बिल का वादा दोहराएं
आओ फिर एक "दिवस" मनाएं

आओ एक दिन की जागरूकता दिखाएं
साल भर चाहे वही गलतियां दोहराएं
उस दिवस पर किए वादों को भूल जायें
सामान्य ज्ञान परीक्षा हो तो बस इन तारीखों को याद कर के जायें
सब "फैशन" है ,"सीरियसली" कौन मानता है
चलो हम भी थोड़े "फैशनेबल" हो जायें
आओ फिर एक "दिवस" मनाएं

Friday, June 5, 2009

नीरज



( नीरज को दोस्त कहना मुझे ज्यादा भाता है पर जो रिश्ता है उसके बनिस्बत कहूँ तो मेरे पति हैं । दो दिन पहले की बात है नीरज ने मुझे मजाक में कहा "जब देखो लिखती रहती हो ,कभी मुझ पर तो कुछ नहीं लिखती"..उसकी आदत है की ऑफिस से आ कर एक बार मेरे ब्लॉग की जरुर देखता है। उन आंखों में जब प्रशंसा और गर्व देखती हूँ तो एक बार फिर कलम उठाने की प्रेरणा मिलती है ..आज की यह रचना मेरी उसी प्रेरणा के लिए है ,मेरे सबसे अच्छे दोस्त के लिए है ..शायद यह सरप्राईज़ अच्छा लगे !!!)

तुम कहते हो तुम पर कभी क्यों नहीं लिखती
कैसे लिखूं ?
कभी शब्द तो कभी पंक्तियाँ ही पूरी नहीं पड़ती
तुम से अपने रिश्ते पर लिखना आसान नहीं है
बस विवाह तक ही इसकी सीमा और सार नहीं है
अब तो जीवन ही तुम संग लिख दिया है
कागज़ पर कुछ लिखूं तो यूँ लगे
भावनाओं को शब्दों में जकड दिया है
आज तुम्हारे लिए कलम उठाई है
क्या वर्णन से न्याय हो पायेगा ,यह भी कठिनाई है
तुम वह आँखें हो जिनसे हूँ देख पाती
पंख जिनसे नित नई उड़ान हूँ भर जाती
रंग जिनसे जीवन का हर इन्द्रधनुष बना है
रौशनी जिस से गुम राहें हूँ ढूंढ़ पाती
तू आइना है
तुझमे देख श्रृंगार अच्छा लगता है
आइना जो सच और गलतियों से मुझे रूबरू करता है
तुम शब्द हो जब निशब्द हूँ हो जाती
गीत जिस पर बरबस नाच जाती
तुम स्वपन हो
स्वपन की सच्चाई भी
कोमल कभी कठोर
कभी कड़वे कभी मीठी मिठाई भी
तुम दोस्त हो
तुमसे कुछ कहते दिल नहीं जिझकता
तुम हर राज़ में शामिल हो
आँगन में तुम्हारे मेरी खुशी तो कभी आंसू का मेला है सजता
निस्वार्थ हो तुम
शर्तें नहीं लगाते हो
जैसी हूँ मैं मुझे वैसे ही अपनाते हो
सफलता में मेरी अपनी सफलता देख पाते हो
मेरे ऊपर कदम रख आगे नहीं बढ़ जाना चाहते हो
तुम कभी माँ कभी पिता
कभी बहन कभी सहेली हो
धीर गंभीर तो कभी चंचल अठखेली हो
दामाद नहीं तुम बेटे हो
छोटे बड़े सब के चहेते हो
करवा चौथ का हर व्रत साथ रखते हो
नारी के सम्मान की , बराबरी की मुझ से भी ज्यादा लडाई लड़ते हो
तुम्हे देखती हूँ तो अपनी किस्मत पर फ़क्र होता है
कल से ज्यादा और कल से कम
हर दिन तुम्हारे लिए प्रेम और आदर बढ़ता है
उपमाएं तो और भी दे दूँ तुम्हे कई
पर तुम वह "नीरज" हो जो नित दिन मेरे मन सरोवर में खिलता है

( जब हमारा विवाह हुआ था तो मैं २१ की और नीरज २४ साल का था ..अब सात साल बीत चुके हैं और ऐसा लगता है जैसी मैं इन सालों में नीरज के साथ बड़ी हुई हूँ... पढ़ाई या करियर ,सच यह है की मेरे लिए मुझ से भी ज्यादा सपने नीरज ने देखे हैं । सामाजिक मान्यताओं को उन्होंने मेरे सामने कभी तरजीह नहीं दी इसलिए मुद्दा शादी के बाद लगभग ५ साल तक पढ़ाई करने का हो या फिर संतान के लिए सबके विरुद्ध जा कर रुकना, नीरज ने हर मोड़ पर दोस्त की तरह साथ दिया ... यदि मैं कहती हूँ कि विवाह बाद मैंने अपना अस्तित्व खोने नहीं दिया तो उसके लिए मुझ से ज्यादा श्रेय नीरज को जाता है ..)

Wednesday, June 3, 2009

सुनो पोस्टिंग आर्डर आया है

एक बार फिर नई पोस्टिंग (ट्रान्सफर) का फरमान आ गया है ..माँ हमेशा खीज जाया करती थी जब मैं कहती थी फौजी से ही शादी करुँगी ,मेरे पिता सेना में नहीं जा पायें उसका बड़ा कारन वहीं थीं ..कहती थी जिंदगी भर खाना बदोशों की तरह समान ढोते हुई घूमेगी। आख़िर में होना तो वही है जो विधि को मंज़ूर होता है तो मेरा गठ्जोडा भी एक फौजी के साथ ही जा कर जुड़ गया वह अलग बात है की माँ भी तब काफ़ी उत्साहित थीं । लगभग सात साल बीत चुके हैं और इन सात सालों में अपना समान कमसकम पाँच बार समेट चुकी हूँ ..गृहस्थी शुरू की थी तो पाँच बक्से थे ,हर साल के साथ २-३ जुड़ते गए। कल की चिट्ठी के साथ एक बार फिर बक्से बनाने की कवायद शुरू हो गई है । फौजी परिवारों की एक ख़ास आदत होती,देश में जहाँ जहाँ रहते हैं वहां की ख़ास चीजे समान में जुड़ती जाती हैं साथ ही साथ बक्से भी जुड़ते जाते हैं और सेवानिवृत्ति के बाद घर संग्रालय सा दिख्नने लगता तो तो । सात सालों में कारगिल की बर्फीली ऊँचाइयों से हैदराबाद की निजामी तहजीब सब कुछ सेना और उसकी पोस्टिंग ओर्डेरों की बतौलत देख पायीं हूँ ।



पोस्टिंग के बारे में पता चलते ही पुराने प्रश्नों की एक टेप फिर से चल जाती है .."पैकिंग कब शुरू करनी है ? घर कितने दिनों में मिल जाएगा ? ट्रक को कब रवाना करना है ? ओह्हो फिर से बारिशों में समान भेजना होगा ?" इन सवालों से जूझते हुए युद्घ स्तर पर पैकिंग का काम शुरू होता है .."किस बक्से में क्या रखना है ,समान की लिस्ट बक्से पर लगायी है या नहीं "..."रसोई तो आख़िर में ही समेटेंगे, पर इतने शो पीस कहाँ पर, कैसे अटेंगे "... " इतने कपड़े क्यों खरीदती हो और मेरे कम्पुटर और म्यूजिक सिस्टम को तो तुम छोड़ ही दो" । १५ दिन तक घर कबूतर खाना सा लगता है और हम दोनों का फ्यूज़ बात बात पर उड़ता है। किसी तरह से निपटा कर ट्रक लोड करने का भी दिन आता है। अब नीरज मुझे ट्रक वाले से बात नहीं करने देता ,उसे पता है कि रिस्क है क्योंकि चिंता से भरे मेरे प्रश्नों की बौझार उसे काम करने से मना करने के लिए बाध्य कर सकती है ।



चिंता क्यों न होगी ...दिल टूट जाता है जब चीनी मिटटी की पसंदीदा प्लेट टूटी हुई निकलती हैं ..या फिर कांजीवरम साडियों में भीगने के कारण फुफुन्दी लगी हुई होती है । ज्यादातर छावनियों में जाते ही घर मिलना मुश्किल होता या फिर अस्थायी तौर पर कुछ उपलभ्द करा दिया जाता । महीने दो महीने के बाद जब घर मिलता है एक बार फिर बक्से खोल,तिनका तिनका निकाल उस मकान को घर बनाने का काम शुरू हो जाता है और फिर जैसे ही उन् दीवारों में ख़ुद को और उस शहर की अनजानी गलियों में ख़ुद के रास्तों को खोज लेते हें तो दिल्ली से फिर एक पोस्टिंग का पैगाम आ जाता है ।

Tuesday, June 2, 2009

कौन है फेमिनिस्ट ?

ख़ुद को "फेमिनिस्ट" कहने में मुझे हमेशा से गर्व रहा है यह अलग बात है कि बहुत से लोग जब इस शब्द का प्रयोग करते हैं तो लगता है जैसे वह उन औरतों (कुछ पुरूष भी ) की बात कर रहें जो उन के अनुसार सामाजिक कायदे कानून से बगावत करने पर आमदा हैं और इसलिए समाज में उन्हें आदर कि अपेक्षा नहीं रखनी चाहिए । "फेमिनिस्ट" होना जैसे जाति बाहर होने जैसा है ,समाज के एक वर्ग के लिए इसका प्रयोग गाली के समान है ..याद है की कॉलेज के दिनों में कुछ सहेलियों की माँ कहा करती थीं कि इस की बातें मत सुना करो ,यह दिमाग ख़राब कर देगी । कॉलेज में एक बार एक प्रोफ़ेसर ने कहा था की यदि मैं शादी का एक साल पूरा कर लूँ तो उन्हें चिट्ठी लिख कर जरुर बताऊँ और शाद्दी के बाद भी पति के ऐसे कुछ मित्र हैं जो अपनी पत्नियों को मुझ से ज्यादा वार्तालाप न करने कि सलाह देते हैं ।



तो आख़िर क्या है "फेमिनिस्ट" होना ? ज्यादातर लोग इसे "पुरूष विरोधी" होना परिभाषित करते हैं और मेरा यह लेख उन्ही लोगों के लिए है । नारीवाद या फेमिनिस्म का मतलब पुरूष विरोधी होना नही अपितु महिलाओं एवं पुरुषों के समान अधिकारों कि लडाई है ..लडाई इसलिए क्योंकि अनेक युगों से यह अधिकार महिलाओं को मांगने भर से नहीं मिले हैं । इतिहास गवाह है कि फ्रांस जैसे देश जिन्होंने विश्व को मौलिक अधिकार, प्रजातंत्र,राष्ट्र, स्वंत्रता जैसे कांसेप्ट्स से अवगत कराया ,क्रांति को एक नया रूप दिया वहां भी महिलाओं को मत डालने का मौलिक अधिकार मिलने मैं अनेको अनेक वर्ष लग गए। आज विश्व आधुनिकता , प्रगति के एक नए शिखर पर खड़ा है पर महिलाएं कभी घर में,कभी कॉलेज स्कूलों में,कभी दफ्तर में तो कभी बस कि कतार में अपने वजूद और उसके लिए सम्मान कि लडाई हर पल लड़ रही हैं ।



फेमिनिस्ट होना पुरुषों के लिए नकारात्मक नहीं है अलबत्ता कुछ पुरूष हैं जो बहुत गर्व से ख़ुद को फेमिनिस्ट कहते हैं । सीधे सादे शब्दों मैं इसका मतलब हैं औरतें उन किसी भी शर्तों पर जीवन जीने के लिए बाध्य नहीं हैं जो एक पुरूष पर लागु नहीं होती और हर वह अधिकार जो पुरुषों के लिए समाज ने तय किया है उसमे औरतों कि भी पुरुषों के समान भागीदारी है । विवाह करने का मतलब यह नहीं कि हमें उस उपनाम का त्याग करना हो जिस से हम २३-२४ साल तक जाने गए हैं , ज्यादा रोष तो मुझे तब होता जब कुछ परिवार अपनी पुत्रवधू का नाम तक बदल देते हैं ..ऐसे नियम पुरुषों के लिए तो नहीं हैं ! विवाह का अर्थ तो नहीं कि जिन माता पिता ने हमें जन्म दिया उन्ही से मिलने के लिए हम ससुराल के हर सदस्य के सामने अर्जी दें और उसके स्वीकार होने कि प्रतीक्षा करें ...क्यूँ बेटों के माता पिता दहेज़ जुटाने कि चिंता मैं रात रात भर नहीं जागते ? क्यों एक पुरूष कभी भी अपने करियर से समझौता करने के लिए बाध्य नहीं किया जाता? क्यों एक साधारण सा दिखने वाला पुरूष अपने लिए जीवन साथी के रूप में विश्वसुन्दरी की कामना रखता और क्यों शादी की लिए होने वाले "परेड" में लड़की का नाखून तक जांचा जाता है ?


फेमिनिस्ट होने का अर्थ है की यदि एक पुरूष को अपनी महिला मित्रों से बात करने की स्वतंत्रता है तो एक महिला के लिए पुरुषों से मेल जोल रखना चरित्र का सवाल नहीं बन जाना चाहिए। जब बी.एड कर रही थी तो एक बार कक्षा में पुरूष सहपाठियों द्वारा एक ऐसी लड़की के बारे में विरोध किया गया जो धुम्रपान करती थी ,तर्क था की लड़कियों को यह सब शोभा नहीं देता ..में इस से दोराय नहीं रखती की सिगरेट पीना सेहत के लिए हानिकारक है पर वहां मुद्दा सेहत का था ही नहीं ,मुद्दा था एक औरत को क्या शोभा देता है क्या नहीं ? मेरे व्ही पुरूष सहपाठी लडकियां बैठे रहने पर भी बिना अनुमति लिए सिगरेट के धुएं के झल्ले उडाया करते थे पर लड़कियों को क्या शोभा देता है क्या नहीं पर राय काफ़ी मजबूत थी । कौन तय करेगा की हमारे लिए क्या शोभनीय है क्या नहीं ?धुम्रपान करना हानिकारक है पर यदि इस चेतावनी को अनदेखा करअपनी मनचाही करने का जितना अधिकार एक पुरूष को है उतना ही एक महिला को भी है तो फिर छवि में भेद भाव क्यों?



फेमिनिस्ट होना इच्छा है रात को २ बजे सड़क पर बेकौफ चलने के ? यह इच्छा है मनमुताबिक कपड़े पहनाने की न की यह आरोप सुनाने की कि बलात्कार और छेड़खानी वास्ताव में लडकियां ख़ुद ही आमंत्रित करती हैं ,फेमिनिस्म का मतलब हैं कन्या भ्रूण हत्या के ख़िलाफ़ मोर्चा उठाना और हर लड़की को सिक्षा दिलाना ...नारीवाद प्रतिक है भाषा,कार्य,अधिकार हर रूप में पुरुषों के बराबरी कि जगह पाने कि ..नारीवाद का मतलब है दफ्तर में हमारे कार्य के लिए इज्ज़त से देखे जन बनिस्बत इस बात के कि हम क्या पहन कर आयें हैं या किसके साथ आयें हैं ...



एक बार सड़क पर किसी से गाड़ी को ले कर बहस हो गई जब मैंने कुछ बोलने का प्रयास किया तो महाशय ने कहा में औरतों से बात नहीं करता ..मुझ से रुका न गया और मैंने कहा कि आप एक औरत से शादी कर सकते हैं ,उसके साथ सो कर बच्चे पैदा कर सकते हैं और यहाँ भी आपका काम सोने तक में ही सिमित होता है..उसकी बाद सब जिमेदारी औरत कि होती है ,औरत आपके लिए खाना बना सकती है और रात ३ बजे तक आपका इंतज़ार कर सकती है , औरत आपके लिए वो हर काम करती है जो आपको ख़ुद करना चाहिए पर फिर भी औरत से बात करना आप कि शान के ख़िलाफ़ है ..फेमिनिस्ट होने का मतलब इन सब बातों पर पूर्ण विराम लगाना है ।



बहुत बार हम सबने कुछ बातें सुनी है जैसे कि "लड़कियों कि तरह मत रो", "मर्द बन के दिखा",क्या औरतों कि तरह बातें बना रहा है" और ऐसा बहुत कुछ ..फेमिनिस्म का मतलब है न केवल भाषा में बल्कि आम जीवन में भी इन धारणाओं को तोड़ना है ..कुछ कहावतें और भी है जैसे जोरू का गुलाम इत्यादि ..देखने कि बात यह है कि समाज और उसकी भाषा कैसे दोनों ही महिलाओं के साथ भेद भाव करते हैं। किसी भी कक्षा कि किताब उठा कर देखें आप पाएंगे कि स्त्रीलिंग नाम एवं सर्वनाम अध्यापिका,सेक्रेटरी, घर के काम इत्यादि से जोड़ कर प्रयोग किए जाते हैं वहीं पुलिस अफसर ,सेना, राजनेता, इत्यादि कार्यों के साथ पुल्लिंग नाम एवं सर्वनाम प्रयुक्त होते हैं। क्या कभी किसी ने "बिन्ब्याहा पिता" या "सिंगल फादर" या "कामकाजी पिता " जैसा कुछ सुना हैं वहीं क्यों बिनब्याही माँ ,वर्किंग मदर आदि सुनते हुए हें अटपटा नहीं लगता ..अटपटा नहीं लगता क्योंकि आदत हो गई हैं...



आदत हो गई हैं महिलाओं के लिए ऐसे बर्ताव की भाषा की ,धारणाओं की ..फेमिनिस्म इन्ही आदतों को तोड़ने का प्रयास हैं ...यह प्रयास हैं अपनी पहचान और आत्मा सम्मान को पुनः परिभाषित करने के ,यह प्रयास हैं उन सभी बन्धनों को तोड़ने का जिन्होंने आज तक महिलाओं को उनकी इच्छा और सम्मान के विरूद्व जकड के रखा हैं ..फेमिनिस्म पुरुश्विरोधी नहीं हैं बल्कि एक प्रयास हैं ख़ुद को पहचानने का और उस पहचान को स्वीकृति दिलाने के ..फेमिनिस्म हैं औरत होने में गर्व महसूस करना ..नाकि यह गुनगुनाना की अगले जनम मोहे बिटिया न कीजो

Monday, June 1, 2009

माँ

(माँ..एक शब्दमें करुना संस्कार का सागर समाया है,भगवान् नहीं हो सकते थे हर जगह तभी माँ को बनाया है

मेरी भी माँ है जिसके पास पंख लगा उड़ जाना चाहती हूँ ,आँखें है नम माँ तुम बहुत याद आती हो ...

आज पुरानी तस्वीरे देखते हुए मम्मी की बहुत याद आई ..कलम उठाई तो उन्ही के लिए कुछ लिखने का प्रयास किया..चाहती हूँ की मम्मी जरुर पढ़ें )


तुम्हारे प्यार ,फटकार, दुलार

कभी डांट कभी मनुहार में पली बढ़ी हूँ मैं

तुमने जन्म दिया तुम्हारा ही प्रतिरूप हूँ मैं


तुम्हारी ऊँगली पकड़ना - चलना

उन्ही को थाम गिर कर उठी हूँ मैं

तुम्ही वह रफ़्तार हो जिस से आगे बढ़ी हूँ मैं

तुमने जन्म दिया तुम्हारा ही प्रतिरूप हूँ मैं


वो आँचल तुम्हारी बाँहों के घेरे

जहाँ दिखे तम में सवेरे

तुम्हारी ही छाया है जिस से ढकी हूँ मैं

तुमने जन्म दिया तुम्हारा ही प्रतिरूप हूँ मैं


तुम्हारी शिक्षा सिद्धांत और बातें

जैसे सभी वेद पुराण हो उन में समाते

तुम ही वह कुम्हार हो जिसके हाथों घड़ी हूँ मैं

तुमने जन्म दिया तुम्हारा ही प्रतिरूप हूँ मैं


तुमसे लड़ना झगड़ना जवाब तक दे जाना

हर बार फिर बात करने की कसम खाना

पर तुम ही वह रस्ता हो जिस पर हर बार वापिस मुडी हूँ मैं

तुमने जन्म दिया तुम्हारा ही प्रतिरूप हूँ मैं


(आज बहुत सी बातें याद रही हैं ..कैसे बचपन में जब मैंने एक फल के झूठे छिलके खाए थे तो मम्मी ने दिनों तक मुझे वही फल खिलाया था ...घर में फ्रिज नहीं था और मैं पड़ोसियों से ठंडा पानी मांगने जाती थी जो माँ को ना गवारा था , सब खर्चों में कटौती कर उन्होंने सबसे पहले मेरे लिए फ्रिज मंगाया था ..एक लहंगा जो उन्होंने अपने हाथ से सिला था ..मेरे गणित के पेपर में रात भर मेरे साथ जगती थी ..हॉस्टल भेज छुप कर रोती थी ..बेटियों से जो भेद भाव की बातें सुनती हूँ वह तो कभी था ही नहीं अलबत्ता कई बार लोग बेटों को उस तरह से बड़ा नहीं करते जैसे हम दोनों बहनों को किया गया ..माँ से सिखा की हमेशा स्पष्टवादी रहो ,बातें लपेट के करना उन्हें आता है उनसे सिखा ...ख़ुद शायद उन्होंने कुछ ही जोड़ी कपड़े बनवाये हो पर हमारी हर जरुरत पुरी की ..याद है मेरी विदाई मैं कितना रोई थी,आज भी रोती हैं जब भी मैं दिल्ली से वापिस आती हूँ...माँ जैसा कोई नहीं होता..शादी से पहले तो शायद इतना समझ में नहीं आता था पर पिछले छेह सालों में उनसे इतना दूर रह कर समझ में आया है ..लव यु माँ !!!)

Thursday, May 21, 2009

प्रधानमंत्री जी सुनिए ..!!!!

देश में नई सरकार लगभग गठित हो चुकी है और समाज के हर एक वर्ग के लिए इसके मायने अलग अलग हैं। भारतीय सेना के एक अफसर की पत्नी होने के नाते मैं थोडी शंकित हूँ ..शंकित हूँ इस बात को ले कर की अगले पाँच वर्षों मैं सशत्र सेनाओं को कितनी अहमियत दी जायेगी। क्या एक बार फिर अपने जायज़ हक की लडाई में हम पर बागी होने का इल्जाम लगाया जाएगा और हमारे हक हमें अहसान की तरह दिए जायेंगे।

सेना कामो बेश हमेशा से कांग्रेस के महत्वपूर्ण मुद्दों से बाहर रही है। ६० के दशक में नेहरू ने सोचा था की पंचशील नीति देश की सुरक्षा के लिए काफ़ी है और सेना पर अधिक व्यय करने की कोई आवश्यकता नहीं ..यह भ्रम चीन के साथ युद्घ के बाद टुटा ,वही चीन जिस के साथ पंचशील समझौते पर हस्ताक्षर किए गए थे । दुःख की बात है प्रजातंत्र की सफलता की बात करते हुए बुधीजीवी राजनीती के बात करते हैं, भारतीय प्रशासनिक सेवा की बात करते और उन्हें इस सफलता के श्रेय भी देते हैं पर इस सफलता में कभी सेना को भागीदार नहीं बनाया जाता है । जब कभी सेना अपने महत्व को याद दिलाने का प्रयास करती है तो उन्हें याद दिलाया जाता है की उनका काम आदेश सुनना है ,प्रशन करना नहीं...

मेरा सवाल छोटा सा है की यदि देश ही नही होगा तो कैसा प्रजातंत्र और कैसी उसकी सफलता ? देश की आन बाण शान रखने के लिए सेना ने अनेक युधों में जो बलिदान दिए हैं वह सर्व विदित हैं और आज भी देश के कुछ ऐसे सीमावर्ती इलाको में हमारे जवान और अफसर सीमा के प्रहरी बन कर तैनात हैं जिनके नाम तक देशवासी नहीं जानते हैं। अपने परिवार से दूर जटिल परिश्तिथियों में उनका उद्येश्य केवल देश की अखंडता और प्रभुता की रक्षा करना है। कोई दंगा,प्राकर्तिक आपदा या आतंकवादी हमला ,सेना की कर्तव्यनिष्ठा केवल देश की सीमाओं तक सीमित नहीं है ...सेना कर्म में विश्वास रखती हैं बातों में नहीं और यही कारन है की टीवी पर बातें करते केवल नेता या बाबू दीखते हैं ,सैनिक नहीं॥

सेना की मांगो को ले कर सरकार की अनदेखी से सैनिको का मनोबल कम हुआ है और युवा वर्ग सेना में आने के लिए इच्छुक नही है। यदि योग्य युवक सेना को एक आकर्षक रोज़गार के रूप में नहीं देखेंगे तो कैसे देश को नए सैनिक मिलेंगे। कुछ लोग कहते हैं के सेना में आना तो जज्बे पर निर्भर होता है रुपये पैसे पर नहीं..मैं मानती हूँ की बहुत से युवक हैं जो अभी भी वर्दी उस से जुड़े अभिमान के लिए पहनना चाहते हैं पर क्या केवल अभिमान और जज्बे से राशन ख़रीदा जा सकता है ?,बच्चों की स्कूल की बढती फीस भरी जा सकती है ?,इस महंगाई में एक छोटा सा घर खरीदा जा सकता है ?

अंत में यही कहना चाहती हूँ की अगले पाँच वर्षों में मैं कांग्रेस से एक बेहतर नजरिये की उम्मीद रखती हूँ । में उम्मीद रखती हूँ की सेना के मनोबल को बढ़ने के लिए कुछ ठोस कदम उठाये जायेंगे और योग्य युवाओं को सेना में आने से सशक्त कारन दिए जायेंगे क्योंकि एक मजबूत सेना देश की मजबूती का आधार है ।

(इस लेख को मेरे पति के कार्य से जोड़ कर न देखा जाए ,यह मेरे व्यक्तिगत विचार हैं )