आज ब्लोग्वानी पर एक लेख का शीर्षक देख कर आँखें रुक गई "देश की सेना ,देश के खिलाफ"(।">http://andarkeebaat.blogspot.com/2009/06/blog-post_09.html)। शीर्षक और लेख दोनों ही देख कर मन रोष से भर उठा ,टिपण्णी कर दी पर दिल फिर भी शांत नही हुआ सो लिखने बैठ गई ।
देश की सेना का देश के खिलाफ होने आरोप लगाया गया है तो यही कहना चाहती हूँ की जब सेना देश के ख़िलाफ़ काम करती है तो पाकिस्तान बनता है , भारत नहीं। यदि सेना कश्मीर में एक लघु पाकिस्तान बनानेमें एक अवरोध के समान खड़ी है तो सेना देश की खिलाफत नहीं देश के प्रति अपना कर्तव्य पूरा कर रही है । इस देश को बनाने के लिए बहुत से शहीदों ने अपने खून से इस मिटटी को सींचा है । अपने प्राणों से देश की रक्षा की है । देश ने इन कुर्बानियों को कितना याद रखा इस पर में जितना कम बोलूं अच्छा है क्यूंकि दिल दर्द से भर उठता है और जब तक ऐसे लेख लिखें जायेंगे मुझे ज्यादा कुछ उम्मीद भी नहीं है । आम जनता को फौज में जाना बेवकूफी लगती है ,बुद्धिजीवियों को सेना मानवाधिकारों की कातिल लगती है , राजनेताओं को सेना की जायज़ मांगों से विद्रोह की बू आती है । देश पर मर मिटना सैनिकों की नौकरी है उस पर इतना शोर शराबा क्यों ..मिल जाएगा एक मैडल । मत बेचारे डाल नहीं पाते इसलिए राजनैतिक समीकरणों पर ख़ास फर्क नहीं पड़ता यही कारण है कि युवाओं के "नेता" आज तक किसी युवा सैनिक का दुःख दर्द पूछने कहीं नहीं गए। काफ़ी कैमरे आसपास थे इसलिए किसी झोपडी का उनके सोने से उद्धार हो गया ,हजारों फीट की किसी सैनिक पोस्ट तो इस बात में भी मात खा गई ।
हाँ तो मैं लेख की बात कर रही थी । वहां प्रश्न उठाया गया की उस सेना की जय जय कार क्यूँ हो जो कश्मीर के हर युवा में आतंकवादी और हर घर को उनकी पनाहगार समझती हो । एक समय था जब पंजाब हिंसा और आतंक के साए में था पर आज उसका नामों निशाँ तक नहीं है और उसका कारण है उस हिंसा की विरूद्व एक जुट होने की वहां के लोगों की इच्छा शक्ति । शायद मेरा यह कहना कुछ लोगों को कड़वा लगे पर कश्मीर के हालात के लिए सेना नहीं ख़ुद वहां के लोग जिम्मेदार हैं । ऐसा लगता है कोई हल नहीं चाहता ,हुर्रियत जब मुंह खोलती है पाकिस्तान की बात करती है , आवाम की उन्हें पुरी शह मिलती है और फिर सवाल यह की एक आम कश्मीरी शक के घेरे में क्यों आता है । कहा गया कि सेना अपने ही नागरिकों पर बन्दूक ताने खड़ी है तो जरा पूछिये वहां जा कर की जब इस देश की मिटटी पर रहते हैं तो विदेशी मुल्क की बात क्यूँ करते हैं ? आप नागरिक नागरिक चिल्ला रहें हैं पहले यह तो पूछिये क्या वह ख़ुद को इस देश का नागरिक मानते हैं । लेख में यह भी लिखा गया कि सेना को बैरकों में वापिस भेजना एक बहुत बड़ी मांग है तो मैं यह याद दिला दूँ कि यदि ऐसा हो गया तो काफ़ी लोग दिल्ली के अपने वातानुकूलित कमरों में बैठ कर सेना पर आक्षेप लगाते हुए लेख नहीं लिख पाएंगे । आज़ादी की साँस और रात की सुकून कि नींद का आप इसलिए आनंद उठा पा रहे हैं क्योंकि कहीं कोई सैनिक रात को जाग रहा है। लेख में यह भी कहा गया की बन्दूक के जरिये लोगो के जीने के हक को छीना जा रहा है तो क्या यही जीने का हक कश्मीरी पंडितों और सिखों का नहीं था ? क्यूँ वह रोटी रोटी को तरस गए और सारे सपने किसी रिलीफ कैंप के टेंट में सिमट गए ?
दिन रात अपनी जान बाजी पर लगाते हुए सैनिक इस देश कि प्रभुता और अखंडता को बचाने की कोशिश कर रहें हैं उन्हें देश के खिलाफ बताया जा रहा है । कैसे मिलेगा इस देश में शहीदों और सेना को सम्मान जब आतंकवाद,देश विरोधी गतिविधियों और उनको सहारा देने वाले लोगों को ह्यूमन राइट्स का चोगा पहना पीड़ित बना दिया जाता है ॥और सेना को बलात्कारी,बन्दूक की भाषा बोलने वाली कहा जाता है जिसके कोई ह्यूमन राइट्स नहीं हैं।
यह सब बातें करने वाले को अंधराष्ट्रवादी करार दिया गया है ..वैसे क्या करें हम उस देश के रहने वाले हैं जहाँ गाँधी नेहरू को महिमा मंडित किया जाता है और सरदार पटेल ,आज़ाद,बोस भगत सिंह का इतिहास के पन्नो में दबा दिया गया है । हम तुष्टिकरण की नीति पर बड़े हुए हैं जो अपने हक की बात करता है उसे सेकुलरिस्म के दुश्मन के नाम से जाना जाता है । हम मांगी हुई आज़ादी देख कर बड़े हुए हैं ,क्रांति जैसे शब्द बस हमारे लिए फिल्मो के शीर्षक हैं ..जब हम १०० करोड़ भारतियों को अनदेखा कर एक विदेशी को इस देश की कमान सौंप सकते हैं तो सेना को देश का दुश्मन भी कह सकते हैं । यदि कुछ लोगों को ऐसे लेख लिख कर लगता है की वह राष्ट्रवादी है तो यकीं मानिये ख़ुद को अंधराष्ट्रवादी कहलाने में मैं ज्यादा गर्व महसूस करती हूँ ।
