Thursday, September 24, 2009

इतने दिन बाद कुछ लिखने का मन हुआ

गत कुछ दिनों में बहुत से मित्रों ने ईमेल के जरिये शिकायत की कि आज कल मैं कुछ लिख क्यों नहीं रहीं हूँ... लिख पाने के कारण कई थे पर एक बहुत बड़ा कारण था कि इन दिनों में दिल ने किसी बात पर प्रतिक्रिया नहीं की ..किसी बात ने इतना छुआ या कचोटा नहीं,लिखने की कोई प्रेरणा या मुद्दा नहीं मिला पर कल फिर कुछ हुआ जो दिल को संवेदना से भर गया।


अभी मेजर आकाश सिंह को शहादत को एक महीना भी नहीं हुआ है कि कल बांदीपुर में मेजर जे. श्रीनिवास सूरी और नायक खुशाल सिंह ने देश के लिए अपने प्राणों कि बाज़ी लगा दी और काफी देर तक चले भीषण एनकाउंटर में दो मेजर और दो जवान भी घायल हुएशहीदों ने अपने प्राण अपने कर्तव्य कि राह में न्यौछावर किए, कई लोगों के लिए इस में कोई बड़ी बात नहीं ..रूटीन ख़बर है ऐसा तो वहां होता ही रहता है ...पर मैं इस विषय पर कुछ भावनात्मक हूँ ,कुछ लोगों ने मुझे कहा भी है कि मैं क्यों एक ही विषय पर इतना लिखती हूँ कारण यह है कि लखनऊ में मायावती कि मूर्तियों, भाजपा कि कलह,राहुल गाँधी की रेल यात्रा त्यादि पर लिखने वाले मित्र बहुत हैं पर सैनिकों के विषय पर मेजर गौतम या जयंत जी जैसे गिने चुने लोगों को लिखते देखा है। ऐसा नहीं कि वह हमारे लिखने के मुहताज हैं,चंद शब्द क्या इन्साफ करेंगे उनके जज्बे से पर मन दुखी हो उठता है जब देखती हूँ कि कहीं कोई देश के लिए जान दे गया है और समाचार चैनल के टिक्कर पर उनके लिए "शहीद हो गए " लिखे जाने की जगह "मारे गए" लिखा हुआ पाती हूँ। ुःख होता है की किसी की जान टिक्कर की एक लाइन भर है पर युवराज सिंह की ऊँगली टूट जाना आधे घंटे की चर्चा का विषयऐसे तो हर जगह की ख़बर दिख जाती है इन चैनलों पर , २४ घंटे से चल रही मुठभेड़ को चैम्पियन ट्राफी की बार बार दोहराई जा रही सुर्खियों और टीम इंडिया को कोच द्वारा दिए गए नए "काम मंत्र " के बीच मिला तो कुछ एक या आधा मिनट।


कल ही वायुसेना अध्यक्षने अपने एक बयान में कहा कि वायुसेना से पास पर्याप्त मारक क्षमता नहीं हैंएक ख़बर के अनुसार वायु सेना अकादमी में दो हफ्ते में पायलट प्रशिक्षण का नया बैच शुरू होने वाला हैं पर प्रथम चरण के प्रशिक्षण में उपयोग होने वाले यानों का पुरा फ्लीट ग्राउंड कर दिया गया हैं -कारण ? गत कुछ समय में ट्रेनिंग के दौरान उन पर हुए जानलेवा हादसे और वह इसलिए क्योंकि ७० के दशक के इन विमानों की उमर अब पुरी हो चुकी है पर कुछ नया खरीदने के लिए रक्षा मंत्रालय के नेता और बाबूओं की नींद अभी नहीं खुली हैऐसी सूरत में ट्रेनिंग शायद सीधे दूसरे चरण से शुरू कि जायेगी जो प्रशिक्षण के नियमों के विरूद्व है


इस देश के नौकर शाहों ने और राजनेताओं ने अपने निहित स्वार्थ में देश की सैन्य क्षमता को खोखला कर दिया हैलालफीताशाही ने, भ्रष्टाचार ने सेना की तकनीकी क्षमता में हमें चीन जैसे देशों से तीन तीन चार चार साल पीछे कर दिया है। एक समाचार चैनल पर आई एक रिपोर्ट के अनुसार भारत के पास जहाँ ४०० आर्टिलरी गन हैं चीन के पास १४०० हैं , उनके ३०० से ऊपर युद्धपोतों के मुकाबले हमारे पास कुछ सौ से ऊपर हैंबाबुओं से ले कर नेता सब रक्षा से जुड़े इन सौदों में अपनी चांदी बनाने में मशगुल हैं और उनके भ्रष्टाचार की बलि कहीं कोई सैनिक चढ़ता है या कोई पायलट


भ्रष्टाचारियों की इसी जमात में शामिल होने के लिए या अपनी मेम्बरशिप को रीन्यू कराने के लिए दो राज्यों में कवायद चल रही है..नेताओं के साथ बेटा बेटियों में भी भी खूब मारामारी है,बहती गंगा में सब हाथ क्या पुरा स्नान करना चाहते हैं। यह और बात है कि देश की बात करने वाले इन खादीधारियों की संतानें देश की बात करती हैं पर सफ़ेद चोगे को छोड़ हरी वर्दी पहनने कि बात कभी नहीं करती ,हर नेता का बेटा नेता और बाबू का बेटा बाबू बनना चाहता हैं ..क्यों? क्या यह बताने कि जरुरत हैं ...दुःख कि बात बस इतनी है कि इन सब ने मिल कर इतना तो तय करा दिया है कि आज एक सैनिक का बेटा सैनिक नहीं बनना चाहता।


Monday, July 27, 2009

श्रद्धांजलि

लगभग एक महीने से ब्लॉग से दूर हूँ ..हमेशा कुछ अधूरा सा लगता रहा। इन दिनों बहुत व्यस्त रही ,न लिखने का समय मिला और न ही नया टेलीफोन कनेक्शन...कुछ तकनीकी कारण बताये गए है देखते है कब तक हो पता है । कल "विजय दिवस" था ..करगिल की लडाई को एक दशक हो चुका है ..तब मैं कॉलेज में थी,कुछ चेहरे तब टीवी पर देखे थे थे ,कल फिर से देखे ..उस युद्घ के दृश्य देखे तो सोचा जब इतने दिनों बाद कुछ लिखना है तो क्यों न श्रद्धांजलि स्वरुप कुछ लिखूं...एक बार फिर एक रचना उन लोगों को समर्पित जो मेरे दिल के सबसे करीब हैं।


कुछ अल्हड़ २४-२५ साल के लड़के ही तो थे
कुछ सपने थे आंखों में
बातों में हँसी मजाक के लहज़े थे
मोटर साइकल हिरोइनों की बातें अच्छी थी लगती
प्रेमिका के नाम की लहरें थी उठती
मटमैली वर्दी, बढ़ी दाढ़ी वाले उन चेहरों को
कल टीवी पर फिर से देखा
आँसूं बरबस फूट पड़े
यह तो थे वही रणबांकुरे
दशक पहले
करगिल द्रास की वादियों में
दुश्मन पर बिजली से जो थे टूट पड़े
विक्रम बत्रा या विजयंत थापर
अनुज नायर या योगेन्द्र यादव
शौर्य के नाम अलग पर गाथा थी एक
साहस नेतृत्व को मिली थी परिभाषा अनेक
दुर्गम उन चोटियों को
ऑंखें जिनकी ऊंचाई नाप नही पाती हैं
फौलादी कुछ क़दमों ने बौना बना दिया
२५ जुलाई तारीख थी जो महज़ एक
"विजय दिवस" बन जाने का मान दिया
५३३ नाम द्रास में बने उस स्मारक पर खुदे हैं
और उन जैसे कितने और
उसी जज्बे को लिए मुस्कुराते हुए अब भी वहां डटें हैं
कभी हो सके तो उस स्मारक के आगे सर झुकाना
"बत्रा टॉप" ,"टाइगर हिल" देखना
गाड़ी अपनी हाइवे "एक अल्फा" पर चलाना
शायद बेहतर समझ पाओ
उस शहादत को जो बर्फीले सन्नाटे में गर्व से सोती है
याद कर जिसे आज भी कोई आँख कहीं रोती है
समय निकाल एक मोमबत्ती उनकी याद में जला देना
सभी करें तो आसान कितना है
१०० करोड़ "अमर जवान ज्योति " बना देना

Sunday, June 28, 2009

लेते हैं एक छोटा सा "ब्रेक"

मेरे पति का पोस्टिंग आर्डर आ गया था यह तो आप सब को मैं पहले ही बता चुकी हूँ (http://priyankasmann.blogspot.com/2009/06/blog-post_03.html) अब कुछ और बताना चाहती हूँ इस कविता के माध्यम से...

पोस्टिंग आ गई थी
पहले ही बता चुकी हूँ जनाब
कुछ दिन अब न लिख पाऊँगी नई पोस्ट
न ही दे पाऊँगी टिपण्णी और जवाब
पैकिंग अनंत नज़र आ रही है
पसीने और धूल में सनी हूँ मैं
कुछ न लिख न ही पढ़ पाने की बुरी लाचारी है
कुछ दिन और यूँ ही चलने के आसार हैं
दमन ,पुणे रुकते हुए
अहमदाबाद से सिकंदराबाद पहुँचने की दरकार है
वहां जा कर भी जल्द कुछ लिख पाऊं लगता नहीं
अरे बी.एस.एन.एल का ब्रॉडबैंड भी पन्द्रह दिन से पहले मिलता नहीं
बक्सों में बंद गृहस्थी भी फिर से जमानी है
तीसरे माले तक सामान ले जाना भी बड़ी परेशानी है
ऐसा नहीं की मैं कुछ बड़ा साहित्यिक लिखती हूँ
कि बिन मेरे लेखन की दुनिया वीरान हो जायेगी
कुछ दोस्त बन गए हैं
बस उन्ही की कमी कुछ दिनों तक खल जायेगी
दोस्ती ही की बात थी
सोचा गायब होने से बता कर जाना ठीक है
मित्रगण कहीं मुझे भी न भूल जायें इसीलिए लगाई यह तरकीब है
क्या कहते हैं वो टीवी में
"मिलते हैं ब्रेक के बाद "
मज़बूरी में ले रही हूँ यह ब्रेक
स्नेह अपना यूँ ही रखियेगा बरक़रार
ब्रेक के बाद एक बार फिर मिलेंगे हम और आप


Wednesday, June 24, 2009

क्यों एक बलात्कारी को फांसी चढाने की व्यवस्था नहीं है ?

गत पाँच छह दिनों से एक शब्द जिसने सबसे ज्यादा विचलित किया हैं वह है "बलात्कार" । कभी सूरत में मासूम छात्राओं के साथ तो कभी इंदौर में अपने बच्चों का दाखिला कराने गई एक महिला का उसी के पति के सामने बलात्कार,कभी हिमाचल में एक विदेशी पर्यटक के साथ तो कभी दिनरात मेहनत कर अपना पेट पालने वाली एक गरीब नौकरानी के साथ ... सड़क,गाड़ी या आलिशान घर ,एक औरत की अस्मत को तार तार कर देने वाले दरिन्दे हर जगह दिखाई दिए। हद तो तब हो गई जब जुर्म की इस कालिख से निजात दिलाने वाली पुलिस भी इसी कालिख से लिपी हुई दिखाई दी और एक महिला ने दिल्ली में चार पुलिस वालों पर थाने के भीतर किए गए बलात्कार का आरोप लगाया जिसकी अब फोरेंसिक पुष्टि हो चुकी है ..और अभी जब मैं यह लिख रही हूँ तो दिल्ली में एक और महिला के साथ गैंग रेपके ख़बर टीवी पर आ रही है।

जितना दुःख इन घटनाओं का है उतना ही रोष उन लोगों पर है जिनके अनुसार ऐसी घटनाओं की जिम्मेदार महिलाएं स्वयं हैं...शाईनीआहूजा एक सेलेब्रिटी हैं इसलिए उन्हें फंसाया जा रहा है "..."जो महिला पुलिस पर आरोप लगा रही है वह एक कुख्यात सट्टेबाज़ की बीवी है इसलिए पुलिस को फंसा रही है "..."लडकियां ग़लत समय पर ग़लत कपड़े पहन कर घर से निकलती हैं "....शहर के बाहरी इलाके में यूँ जाने की क्या जरुरत थी "।

मैं जानना चाहती हूँ कि कौन औरत हैं जो यह चाहेगी की वह ऐसे घिनौने कृत्य की शिकार हो? कौन औरत होगी जो अपनी इस पीड़ा का ढोल पीटना चाहेगी ?कैसे एक पुरूष की गरिमा हर रूप में बरक़रार है,बलात्कारी भी है तो कुछ लोगों की सहानुभूति मिल जाती,कुछ दिन बाद उस ke नाम की बदनामी भुला दी जाती है॥शादी ब्याह भी यह कह कर हो जाते हैं की लड़का था, लड़कों से तो ऐसी गलतियां हो जाती हैं पर क्यों एक औरत के लिए उसी गरिमा को बचाना हर पल का संघर्ष..क्यों सब कुछ खो देने के बाद भी उसी को सवालों के जवाब देने पड़ते हैं और क्यों आजीवन उसे इस कड़वी सच्चाई से रूबरू करवाया जाता है और सारे सपने कहीं खो जाते हैं ।

क्यों एक अभिनेता की इज्ज़त है पर उसकी गरीब नौकरानी की नहीं ? क्या एक महिला इसलिए खंडित की जा सकती है ,उसके दर्द पर इसलिए सवाल लग जाते हैं क्योंकि उसका पति सट्टेबाज़ है ...एक बलात्कारी कैसे सुनसान या भीड़ में दिन या रात में कहीं भी कभी भी बेखौफ घूम सकता है पर एक शरीफ बाल बच्चेदार दंपत्ति को यह आजादी नहीं है ।

जवाब देने की जिम्मेदारी जिन लोगों पर है वह कह देते हैं कि कार्यवाही ho रही है ,जल्द एक्शन लिया जाएगा ..पर यह जल्द आएगा कब? ऐसा तो नहीं कि यह समस्या दो दिन पहले ही उत्पन्न हुई है तो फिर कमी कहाँ है कि ऐसे कृत्यों से समाज को निजात नहीं मिल पा रहा है अलबत्ता सच्चाई यह है कि हर दिन के साथ इस में बढोतरी हो रही है । कारण है पुलिस और न्यायपालिका दोनों का ही उदासीन रवैय्या । गवाह तो अमूमन ऐसे केस में होते हीं नहीं हैं और जहाँ पैसे से हर चीज़ खरीद ली है तो सबूत क्या बड़ी बात है । यदाकदा जब कोई केस कचहरी पहुँच जाता है तो सालों तक घसीटता ही जाता है और हर सुनवाई में प्रश्नों कि जो बौझार पीड़ित महिला को झेलनी होती है उस से उसका सम्मान बार बार छलनी किया जाता है । इक्कादुका केस को छोड़ जहाँ बलात्कार के बाद कत्ल भी हुआ ऐसी बहुत कम घटनाएं हैं जहाँ पुलिस या न्यायपालिका उम्दा तफ्तीश और शीघ्र कठोर सज़ा का ऐसा उदहारण पेश कर पाई हो जो ऐसी घटनाओं पर अंकुश लगाने में कारगर साबित हो ..भारतीय दंड संहिता के बलात्कार से जुड़ी धाराओं में संशोधन भी बहुत लंबे समय से की जा रही मांगों में से है।

बलात्कार एक औरत कि न केवल देह अपितु मन और आत्मा का भी खंडन है ..मृत्यु के बाद एक व्यक्ति पीड़ा से मुक्त हो जाता है पर बलात्कार मृत्यु से भी ज्यादा दुखदायी है क्योंकि एक पीडीत को इस दर्द के साथ आजीवन रहना पड़ता है । वह देश जहाँ औरत को देवी के रूप में पूजा जाता है उसी देश में औरत मात्र भोग की वस्तु क्यों बन गई है? क्यों उसकी इज्ज़त का मोल इतना कम है ? क्यों हर बार सड़क पर चलते हुए भेड़ियों सी निगाहें हम पर आकर टिक जाती हैं ? क्यों एक बार बस से उतर कर फिर चढ़ने का मन नहीं करता ? क्यों जिसको जैसा मौका मिलता है हमें छु कर निकलता है ..फब्तियां जो कानों में पड़ती हैं उन्हें सुन बहरा हो जाने का मन क्यों करता है ? क्यों सिर्फ़ हमें ही उपदेशों,सीखों सवालों का सामना करना पड़ता है ..क्यों एक पुरूष जैसी ही मेरी स्वतंत्रता नहीं है ?क्यों एक बलात्कारी को फांसी पर चढाने की न्याय व्यवस्था नहीं है ?

Monday, June 15, 2009

क्यों नहीं हम भगत सिंह की बात करते ?

परसों एक सह अध्यापिका से शहीद भगत सिंह के विषय में बात हो रही थी और उनकी एक टिपण्णी से मैं विचलित हो उठी । उनके अनुसार भगत सिंह एक "टेररिस्ट" यानि आतंकवादी थे और इसलिए अहिंसावादी हमारे देश मेंउनकी बात करना अनुचित है। उन्हें अपनी बात कहने की आज़ादी थी सो उन्होंने कह दी पर मुझे नही पता की मैं ज्यादा दुखी किस बात से हूँ - इस से कि उन्होंने भगत सिंह जैसे महान शहीद को आतंवादी कहा ,इस से कि ऐसे बहुत से लोग हैं जो ऐसा ही सोचते हैं या फिर इस बात से कि वह एक अध्यापिका हैं जो आज के युवा वर्ग कि सोच निर्धारित करने में एक अहम् भूमिका रखती हैं या फिर इस बात से कि जैसे आज तक भगत सिंह के व्यक्तित्व को इस देश कि जनता से अनजान रखा गया क्या आगे भी ऐसे ही होगा , क्या इतिहास ही की तरह इस देश की सरकारें और उन सरकारों को चुनने वाले लोग हमेशा इस वीर के बारे में बात करने से जिझकेंगे?

बहुत आसानी से उन्होंने आतंकवादी शब्द का प्रयोग एक देशभक्त के लिए कर दिया और यह तक याद न रखा कि आज इस शब्द के मायने क्या हैं। ऐसा नहीं है कि ऐसा करने वाली वह पहली हैं ..पहले भी क्रांतिकारियों को आज़ादी मिलने के बाद भी भी आतंकवादी कह कर संबोधित किया जाता रहा है । कुछ साल पहले एक स्टेट बोर्ड कि हिन्दी की पुस्तक में "आज़ाद" को आतंकवादी कि संज्ञा दी गई थी । कहने वालों का तर्क यह है कि आतंकवादी वह होता है जो राज्य की शासन प्रणाली के विरूद्व होता है और अपनी बात मनवाने के लिए हिंसा का सहारा लेता है और यूँ देखें तो भगत सिंह और उनकी नीति इसी परिभाषा पर आधारित थी। मेरा मतभेद निम्न मुद्दों पर है -

१) आज हम आतंकवाद को जैसे समझते हैं उसको ध्यान में रखते हुए क्या लोगो द्वारा चुनी गई प्रजातान्त्रिक सरकार और देश को गुलाम रखने वाली एक विदेशी हुकूमत की "स्टेट" के नाम पर तुलना की जा सकती है। आज आतंकवादी जिस "स्टेट" के विरुद्ध हैं और भगतसिंह जिस "स्टेट" के विरूद्व थे क्या उसमे कोई फर्क नहीं ?

२) आज़ादी की जो परिभाषा आज आतंकवादियों ने तय की हुई है क्या उसकी तुलना भगतसिंह के आजाद भारत के सपने से की जा सकती है ?

३) जेहाद के नाम पर आतंकवादी संगठन जिस तरह मासूम युवकों को बहका कर उन्हें अपना माध्यम बना रहे हैं क्या उसकी तुलना भगतसिंह के "इंक़लाब जिंदाबाद" के नारे से की जा सकती है जो अनेको अनेक युवकों का आज़ादी के संग्राम में युध्नाद बना ।

४) क्या हिजबुल मुजाहीदीन की तुलना "हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन असोसिईशन" से की जा सकती है ?

५) जिस तरह आज मासूमों को कभी ट्रेन में तो कभी बस में बम रख कर मारा जा रहा है क्या उसकी तुलना "सौन्डर्स" को उसके सही अंजाम तक पहुचाने से की जा सकती है ?

यह सब तुलनाएं नहीं की जा सकती और जो यह तुलनाएं कर सकता है उसके भारतीय होने पर मेरा पूरा संदेह है । यदि यह तुलनाएं नहीं की जा सकती तो फिर आज के सन्दर्भ में भगतसिंह या उन जैसे अन्य क्रांतिकारियों को आतंकवादी कहना क्या ठीक है ?जिस आतंकवाद की आग में आज सारा विश्व जल रहा है उसी आतंकवाद का प्रयोग "विश्व भाईचारे " की बात करने वाले भगतसिंह के चरित्र वर्णन के लिए करना क्या ठीक है ?

एक राष्ट्र नायक के लिए ऐसे संदेह और संज्ञाएँ इसलिए हैं क्योंकि यह देश उनकी बात नहीं करता। भगतसिंह देश के पहले कम्युनिस्ट थे और समाज के हर वर्ग के लिए खासकर मजदुर और किसान वर्ग के लिए उन्होंने हक की बात की थी । उन्ही के अनुसार क्रांति केवल बम या पिस्तौल की भाषा बोलना नहीं बल्कि अन्याय पर आधारित मौजूदा कार्य एवं शासन व्यवस्था को बदलना है । वह मानते थे कि राजनैतिक आज़ादी आर्थिक आज़ादी के बिना अधूरी है । यह बहुत शर्म कि बात है कि आज कल के तथाकथित कम्युनिस्ट उस कम्युनिस्ट की बात नहीं करते जिसकी नीतियों में राजनीती या निहित स्वार्थ कि मिलावट नहीं थी ।

भगतसिंह धर्मं और राजनीती के मिश्रण को देश के लिए हानिकारक मानते थे । उनका मानना था कि धर्मं के नाम पर बँट कर हम अंग्रेज़ी हुकूमत को मजबूत कर रहे हैं । यही कारण है कि "सर्व धर्मं सम्भाव" के नाम पर कांग्रेस द्वारा मंत्रो और आयतों का एक साथ उच्चार कराने ,"राज करेगा खालसा" जैसे उदघोश के वह पुरजोर विरोधी थे क्योंकि उनके अनुसार जब तक धार्मिक चिन्हों या प्रतीकों का प्रयोग होता रहेगा तब तक एक आम आदमी ख़ुद को सबसे पहले एक हिन्दुस्तानी कभी न समझ पायेगा। शर्म की बात है कि वह जो सच्चा सेकुलर था और जिसकी धर्मनिरपेक्षता वोट पाने या तुष्टिकरण के लिए नहीं थी ,उस भगतसिंह की बात आज कल की तथाकथित "सेकुलर", "धर्मंनिरपेक्ष".."साम्प्रदायिकता की दुश्मन" पार्टियाँ भी नहीं करती ।

भगतसिंह जातिवाद के सबसे बड़े निंदक थे । यही कारण है कि अपने आखिरी दिनों में उन्होंने एक सफाई करने वाली महिला के हाथ की बनी रोटी खाने कि इच्छा जाहिर कि थी और उस महिला को अपनी माँ के समान आदर देते हुए उस रोटी को "बेबे की रोटी" कहा था। जातिवाद पर राजनेताओं की दो मुहि नीति की उन्होंने हमेशा कड़े शब्दों में निंदा की। मदन मोहन मालवीय जिन्होंने एक सभा में एक सफाई कार्मिक के हाथों माला पहनने के बाद कपडों समेत स्नान कर लिया भगतसिंह की आलोचना से नहीं बच पाए थे। महात्मा गाँधी आजीवन किसी हरिजन की कुटिया की जगह संभ्रांत व्यापारिक घरानों के घरों में रहे और वर्ण व्यवस्था की भी किसी न किसी रूप में वकालत की। आज इन सब को याद किया जाता है पर शर्म और दुःख की बात है कि "दलित","हरिजन" आदि शब्दों पर वोट मांगने वाली पार्टियां जातिवाद के इस सबसे बड़े आलोचक की बात नहीं करती।

भगतसिंह क्रांति को एक बड़ा हथियार मानते थे और उनका मानना था कि केवल बातें करने से काम नहीं चलता। देश के हित में यदि खून भी बहाना पड़े तो हिचकना नहीं चाहिए । राष्ट्रीय सम्मान उनके लिए अमूल्य था और उसे पाने और सुरक्षित रखने के लिए प्राणों कि आहुति देना वह बड़ी बात नहीं मानते थे। दुःख कि बात है कि "आर पर कि लडाई " की बात करने वाली पार्टियां , आतंकवादियों को मुंह तोड़ जवाब देने वाली पार्टियां भी भगतसिंह की बात नहीं करती ।

भगतसिंह की अध्ययन में गहन रूचि थी और इसीलिए वह वैज्ञानिक और दार्शनिक तर्क वितर्कों के हिमायती थे। लेनिन,मार्क्स, फ्रांस और रूस की क्रांति के विस्तृत अध्ययन के कारण ही मानवाधिकार,राजनैतिक अधिकारों के वह हिमायती थे। उनकी यही सोच थी जिसके चलते उन्होंने जेल में भारतीय कैदियों के साथ बुरे बर्ताव के विरोध में आन्दोलन किया था और अन्न -जल तब तक त्याग दिया था जब तक की कैदियों की मांगे मान नहीं ली गई थीं तो फिर क्यों आज महाज्ञाता बुद्धिजीवी मानवाधिकारों के नाम पर कसब जैसे आतंकवादियों की तो बात करते हैं पर उस भगतसिंह की बात नहीं करते जो इन अधिकारों के लिए बंदी होते हुए भी अंग्रेजों से भिड गया था और अपनी उम्र के दुसरे दशक में ही उन लोगों से ज्यादा ज्ञानी था जो सारी उम्र पुस्तकों में निकल देते हैं ।

क्यों नहीं हम भगत सिंह की बात करते ? हम यह बात इसलिए नहीं करते क्योंकि हमारा इतिहास उनकी बात नहीं करता और इतिहास इसलिए बात नहीं करता क्योंकि उसे या तो अंग्रेजों ने लिखा है या इस देश की कुछ राजनैतिक पार्टियों ने - अपने जीवन में भगतसिंह अंग्रेज़ी और ऐसी पार्टियों की नीतिओं के पुरजोर विरोधी रहे और इसलिए यह बहुत अचंभे की बात नही है कि जहाँ इसी इतिहास ने हमें बहुत से "माता" "पिता" तो दिए पर भारत माँ का एक सपूत इतिहास के इन्ही पन्नों में दबा दिया गया। "डोमिनियन स्टेटस " की बात करने वाले लोग देशभक्त हो गए, आज़ादी के नायक होगए और पूर्ण आज़ादी की लडाई लड़ने वाले "कुछ राह भटके नौजवान" बन कर रह गए। अहिंसा इस देश का मूलमंत्र बन गई पर गीत गाते हुए फांसी पर झूल जाने वाले कुछ सरफिरे हो गए। वह जो राजनैतिक रोटियाँ सेकते रहे , ब्रिटिश हुकूमत के दरबारी बन कर रहे महिमा मंडित हो गए पर वह जो निस्वार्थ विदेशी हुकूमत से टक्कर लेते रहे आज़ादी की राह में रूकावट हो गए। जिन्होंने धर्मं के नाम पर देश के टुकड़े करा दिए उनकी मूर्तियाँ लगी हैं हर चौराहे पर और वह जिसने धर्मं ताक पर रख कर उद्देश्य की सफलता के लिए केश तक कटवा दिए ,धर्मं की बात छोड़ दी उसे याद दिलाती हुई एक तख्ती भी मुश्किल से दिखाई देती है।

क्यों नहीं हम बात करते भगतसिंह की ? कैसे २ अक्तूबर और १४ नवम्बर हमें याद रह जाते हैं पर २७ सितम्बर को कोई मोल नही? २१ मई ,३० जनवरी को कैसे हम शोक मना लेते हैं पर २३ मार्च हर साल आने वाली एक तारीख भर है । कैसे इस देश में नेता ,अभिनेता "भारत रत्ना"पा जाते हैं पर भगतसिंह,राजगुरु ,आज़ाद का योगदान किसी को भी इस सम्मान के लायक नहीं लगता ।

यदि इतने ही मामूली थे भगतसिंह तो २० वर्ष के भगतसिंह ५८ वर्ष के गाँधी की लोकप्रियता को टक्कर कैसे दे रहे थे ? गाँधी क्यों फांसी टालने के लिए दबाव बनाने की जगह अँगरेज़ गृह सचिव को भगतसिंह की फांसी के बाद जनसाधारण की भावनाओं को सुनियोजित तरीके से सँभालने की सलाह दे रहे थे ? और क्यों गाँधी के राजनैतिक जीवन में पहली बार ,भगतसिंह के शहादत के एक हफ्ते बाद १९३१ के कराची अधिवेशन में उन्हें काले झंडे विरोधस्वरूप दिखाए गए थे और रोष तब ताक शांत नहीं हुआ था जब तक गाँधी ने भगतसिंह की शहादत पर अपने भाव और शोक व्यक्त नहीं किया था।

पर कैसे उम्मीद की जा सकती है कि यह देश भगत सिंह के बारे में बात करेगा क्योंकि उन्होंने कहा था कि क्रांति के बिना मिली आज़ादी का कोई मोल नहीं रहेगा ,धर्मं जाती के नाम पर मिली आज़ादी को कोई मोल नहीं होगा और आज हर वह बात जिसके वह निंदक थे आज हमारे देश के चरित्र का हिस्सा बन चुकी है - शोषण , जातिवाद, धार्मिक असहिष्णुता ...भगतसिंह ने कहा था एक नए देश का प्रारूप तभी बन सकता है जब आज़ादी क्रांति से मिले और जिस व्यवस्था से हम लड़ रहे हैं वह जड़ से ख़तम कर दी जाए जैसे फ्रांस ,रूस ,अमरीका में हुआ । यदि आज़ादी समझौते पर मिली तो हम इस विदेश हुकूमत का बोझ हमेशा ढोयेंगे और आम आदमी हमेशा यूँ ही गुलाम रहेगा बस शोषण करने वाले उसके शासकों की चमड़ी का रंग बदल जाएगा । क्यों एक ऐसा देश जिसके बन जाने का उन्हें हमेशा डर था उनकी बात करेगा ? क्यों ऐसे शासक जिनको राजनैतिक स्वार्थ की राह में जिस भगतसिंह की नीति अवरोध लगती हो उसी भगतसिंह की बात करेंगे ?

मैं दुखी हो जाती हूँ कि कोई सैनिकों कि बात नहीं करता पर जब यहाँ कोई शहीद भगत सिंह की बात नहीं करता तो एक सैनिक की क्या करेगा। जब हमने उनके बलिदान को भुला दिया ,उन्हें आतंकवादी कह उस बलिदान का तिरस्कार कर दिया तो एक सैनिक उम्मीद ही क्या कर सकता है ।

Wednesday, June 10, 2009

एक सैनिक से साक्षात्कार

कल के लेख ही की एक कड़ी यह कविता है । कविता की शुरुआत एक शेर से करना चाहूंगी जो पापा ने घर पर फ्रेम कर के लगाया था
"उनकी गुरबत पर नहीं है एक भी दीया
जिनके खूं से जलते थे चिराग-ऐ-वतन
जगमगा रहें हैं मकबरे उनके
जो बेचा करते थे शहीदों के कफ़न "


क्यों खड़े हो बर्फीली किसी चोटी
कभी रेगिस्तान की धूल खाते
या घने जंगल के अंधियारे में ?
क्यों आ खड़े हुए हो दंगों में
बाढ़ या भूकंप के गलियारों में ?
पाँच कदम की इस पोस्ट पर
क्यों तुम्हारा दम नहीं घुटता ?
अपने घाव खरोंचों पर क्यों तुम से मरहम नहीं लगता?
क्यों मुट्ठी भर सिक्कों के लिए
अमूल्य अपनी जान को ताक पर रखा है?
क्यों भूल गए
घर का छप्पर है टूटा ,माँ है बीमार
बीवी अकेली है बच्चे को कल तक था तेज़ बुखार
क्यों साल दर साल सामान उठा दर- दर की ख़ाक खाते हो?
कितनी उंगलियाँ हैं तुम पर उठती
अनाचारी ,देश विरोधी हो तुम
तो क्यों सारे देश को अपना घर बताते हो ?
बारूद के ढेर पर खड़े
"बुद्धिजीवियों" की गालियाँ
कभी दुश्मन की गोलियाँ झेलते हुए
क्या थक नहीं जाते हो ?
क्यों नौकरी को नौकरी की तरह नहीं करते ?
क्यों पाँच बजते ही घर न रुख नहीं करते
रविवार क्यों नहीं मनाते
धरने और हड़तालें क्यों नहीं करते ?
तुम्हे छोड़ सब करते हैं
देश रुका है क्या ?
तो तुम अनुशासन, देश धर्म की बातों में क्यों उलझ जाते हो
क्यों देश, देशभक्ति की बातों में दीवाने हुए जाते हो ?
याद रखो अब यह किताबी बातें हैं
आजकल इनका अर्थ नहीं ,कोई इनका मोल नहीं है लगाता
छालों से भरे, गले अपने पैरों को
वर्दी के इन जूतों से कभी निकाल कर देखो
तुम्हे लगता है इनके निशान समय की रेत पर कोई रहने देगा ?
जो थे वही मिटा दिए गए हैं
तो फिर क्यों दिन रात चले जाते हो
किसी के कल के लिए क्यों अपना आज दांव पर लगाते हो ?
क्यों अपने माथे पर सब की तरह
प्रान्त,जाती,धर्म की मोहर नहीं लगाते हो
लगाते तो शायद फायदे में रह जाते
यह मोहरें जब सरकारें बदल देती है
तो शायद तुम भी अपनी बदी बदल पाते
क्यों मिट जाने को तैयार हो ?
शहादत तुम्हारी बस एक मौत बन कर रह जायेगी
सुर्खियाँ तो नेताओं के वादों ,
अभिनेताओं के अंदाज़ के हिस्से ही आएँगी
ज्यादा हुआ तो दो खादीधारी चुनाव को धयान में रखते हुए
तुम्हारे घर हो आयेंगे ,हर न्यूज़ चैनल पर अपना मुह दिखायेंगे
एक मैडल थमा देंगे - मरणोपरांत
उद्घोषक की कुछ पंक्तियों में तुम्हारा असीम साहस सिमट जाएगा
और यूँ देश के कर्णधार अपने हिस्से का काम कर जायेंगे
और तुम ही से दीवाने तुम्हारी विधवा और बच्चे
हर पल से संघर्ष करते हुए
उस मैडल के गर्व और तुम्हारी तस्वीर के साथ
अपना जीवन जीते जायेंगे

इतने क्यों सुन कर भी
उसका चेहरा बेफिक्री से खिल जाता है
यूँ लगता है यह बहस बेकार गई
और मेरे इन सवालों का जवाब
वह सैनिक कुछ यूँ दे जाता है
माँ से जो प्यार होता है बेटा उसका मोल नहीं लगाता
कर्तव्य की राह में कुछ मिलने की आस करूँ
तो कर्तव्य न रह कर वह व्यापार है हो जाता
दुःख होता है कभी कभी
जब नीयत पर मेरी सवाल उठ जाते हैं
कुछ साथी इन बाँहों में जब दम हैं तोड़ जाते
क्या करूँ जज़्बात तो फौलादी हैं पर सीने में दिल भी है धड़कता
निश्चय है मेरा अडीग
यूँ ही कुछ बातों और गोलियों से नहीं है हिल जाता
इसलिए हर दिन हर पल नए कुछ प्रण हूँ मैं कर जाता
नौकरी ही होती तो कुछ और भी कर लेता
यह वर्दी मेरा धर्म है
इसकी आन, देश की शान में कुछ भी कर जाऊँ
इस माटी से बना हूँ
सौभाग्य यदि इसी मिटटी से ही मिल जाऊँ
में वीर तभी कहाऊ
जब देश के काम आऊं