Tuesday, June 2, 2009

कौन है फेमिनिस्ट ?

ख़ुद को "फेमिनिस्ट" कहने में मुझे हमेशा से गर्व रहा है यह अलग बात है कि बहुत से लोग जब इस शब्द का प्रयोग करते हैं तो लगता है जैसे वह उन औरतों (कुछ पुरूष भी ) की बात कर रहें जो उन के अनुसार सामाजिक कायदे कानून से बगावत करने पर आमदा हैं और इसलिए समाज में उन्हें आदर कि अपेक्षा नहीं रखनी चाहिए । "फेमिनिस्ट" होना जैसे जाति बाहर होने जैसा है ,समाज के एक वर्ग के लिए इसका प्रयोग गाली के समान है ..याद है की कॉलेज के दिनों में कुछ सहेलियों की माँ कहा करती थीं कि इस की बातें मत सुना करो ,यह दिमाग ख़राब कर देगी । कॉलेज में एक बार एक प्रोफ़ेसर ने कहा था की यदि मैं शादी का एक साल पूरा कर लूँ तो उन्हें चिट्ठी लिख कर जरुर बताऊँ और शाद्दी के बाद भी पति के ऐसे कुछ मित्र हैं जो अपनी पत्नियों को मुझ से ज्यादा वार्तालाप न करने कि सलाह देते हैं ।



तो आख़िर क्या है "फेमिनिस्ट" होना ? ज्यादातर लोग इसे "पुरूष विरोधी" होना परिभाषित करते हैं और मेरा यह लेख उन्ही लोगों के लिए है । नारीवाद या फेमिनिस्म का मतलब पुरूष विरोधी होना नही अपितु महिलाओं एवं पुरुषों के समान अधिकारों कि लडाई है ..लडाई इसलिए क्योंकि अनेक युगों से यह अधिकार महिलाओं को मांगने भर से नहीं मिले हैं । इतिहास गवाह है कि फ्रांस जैसे देश जिन्होंने विश्व को मौलिक अधिकार, प्रजातंत्र,राष्ट्र, स्वंत्रता जैसे कांसेप्ट्स से अवगत कराया ,क्रांति को एक नया रूप दिया वहां भी महिलाओं को मत डालने का मौलिक अधिकार मिलने मैं अनेको अनेक वर्ष लग गए। आज विश्व आधुनिकता , प्रगति के एक नए शिखर पर खड़ा है पर महिलाएं कभी घर में,कभी कॉलेज स्कूलों में,कभी दफ्तर में तो कभी बस कि कतार में अपने वजूद और उसके लिए सम्मान कि लडाई हर पल लड़ रही हैं ।



फेमिनिस्ट होना पुरुषों के लिए नकारात्मक नहीं है अलबत्ता कुछ पुरूष हैं जो बहुत गर्व से ख़ुद को फेमिनिस्ट कहते हैं । सीधे सादे शब्दों मैं इसका मतलब हैं औरतें उन किसी भी शर्तों पर जीवन जीने के लिए बाध्य नहीं हैं जो एक पुरूष पर लागु नहीं होती और हर वह अधिकार जो पुरुषों के लिए समाज ने तय किया है उसमे औरतों कि भी पुरुषों के समान भागीदारी है । विवाह करने का मतलब यह नहीं कि हमें उस उपनाम का त्याग करना हो जिस से हम २३-२४ साल तक जाने गए हैं , ज्यादा रोष तो मुझे तब होता जब कुछ परिवार अपनी पुत्रवधू का नाम तक बदल देते हैं ..ऐसे नियम पुरुषों के लिए तो नहीं हैं ! विवाह का अर्थ तो नहीं कि जिन माता पिता ने हमें जन्म दिया उन्ही से मिलने के लिए हम ससुराल के हर सदस्य के सामने अर्जी दें और उसके स्वीकार होने कि प्रतीक्षा करें ...क्यूँ बेटों के माता पिता दहेज़ जुटाने कि चिंता मैं रात रात भर नहीं जागते ? क्यों एक पुरूष कभी भी अपने करियर से समझौता करने के लिए बाध्य नहीं किया जाता? क्यों एक साधारण सा दिखने वाला पुरूष अपने लिए जीवन साथी के रूप में विश्वसुन्दरी की कामना रखता और क्यों शादी की लिए होने वाले "परेड" में लड़की का नाखून तक जांचा जाता है ?


फेमिनिस्ट होने का अर्थ है की यदि एक पुरूष को अपनी महिला मित्रों से बात करने की स्वतंत्रता है तो एक महिला के लिए पुरुषों से मेल जोल रखना चरित्र का सवाल नहीं बन जाना चाहिए। जब बी.एड कर रही थी तो एक बार कक्षा में पुरूष सहपाठियों द्वारा एक ऐसी लड़की के बारे में विरोध किया गया जो धुम्रपान करती थी ,तर्क था की लड़कियों को यह सब शोभा नहीं देता ..में इस से दोराय नहीं रखती की सिगरेट पीना सेहत के लिए हानिकारक है पर वहां मुद्दा सेहत का था ही नहीं ,मुद्दा था एक औरत को क्या शोभा देता है क्या नहीं ? मेरे व्ही पुरूष सहपाठी लडकियां बैठे रहने पर भी बिना अनुमति लिए सिगरेट के धुएं के झल्ले उडाया करते थे पर लड़कियों को क्या शोभा देता है क्या नहीं पर राय काफ़ी मजबूत थी । कौन तय करेगा की हमारे लिए क्या शोभनीय है क्या नहीं ?धुम्रपान करना हानिकारक है पर यदि इस चेतावनी को अनदेखा करअपनी मनचाही करने का जितना अधिकार एक पुरूष को है उतना ही एक महिला को भी है तो फिर छवि में भेद भाव क्यों?



फेमिनिस्ट होना इच्छा है रात को २ बजे सड़क पर बेकौफ चलने के ? यह इच्छा है मनमुताबिक कपड़े पहनाने की न की यह आरोप सुनाने की कि बलात्कार और छेड़खानी वास्ताव में लडकियां ख़ुद ही आमंत्रित करती हैं ,फेमिनिस्म का मतलब हैं कन्या भ्रूण हत्या के ख़िलाफ़ मोर्चा उठाना और हर लड़की को सिक्षा दिलाना ...नारीवाद प्रतिक है भाषा,कार्य,अधिकार हर रूप में पुरुषों के बराबरी कि जगह पाने कि ..नारीवाद का मतलब है दफ्तर में हमारे कार्य के लिए इज्ज़त से देखे जन बनिस्बत इस बात के कि हम क्या पहन कर आयें हैं या किसके साथ आयें हैं ...



एक बार सड़क पर किसी से गाड़ी को ले कर बहस हो गई जब मैंने कुछ बोलने का प्रयास किया तो महाशय ने कहा में औरतों से बात नहीं करता ..मुझ से रुका न गया और मैंने कहा कि आप एक औरत से शादी कर सकते हैं ,उसके साथ सो कर बच्चे पैदा कर सकते हैं और यहाँ भी आपका काम सोने तक में ही सिमित होता है..उसकी बाद सब जिमेदारी औरत कि होती है ,औरत आपके लिए खाना बना सकती है और रात ३ बजे तक आपका इंतज़ार कर सकती है , औरत आपके लिए वो हर काम करती है जो आपको ख़ुद करना चाहिए पर फिर भी औरत से बात करना आप कि शान के ख़िलाफ़ है ..फेमिनिस्ट होने का मतलब इन सब बातों पर पूर्ण विराम लगाना है ।



बहुत बार हम सबने कुछ बातें सुनी है जैसे कि "लड़कियों कि तरह मत रो", "मर्द बन के दिखा",क्या औरतों कि तरह बातें बना रहा है" और ऐसा बहुत कुछ ..फेमिनिस्म का मतलब है न केवल भाषा में बल्कि आम जीवन में भी इन धारणाओं को तोड़ना है ..कुछ कहावतें और भी है जैसे जोरू का गुलाम इत्यादि ..देखने कि बात यह है कि समाज और उसकी भाषा कैसे दोनों ही महिलाओं के साथ भेद भाव करते हैं। किसी भी कक्षा कि किताब उठा कर देखें आप पाएंगे कि स्त्रीलिंग नाम एवं सर्वनाम अध्यापिका,सेक्रेटरी, घर के काम इत्यादि से जोड़ कर प्रयोग किए जाते हैं वहीं पुलिस अफसर ,सेना, राजनेता, इत्यादि कार्यों के साथ पुल्लिंग नाम एवं सर्वनाम प्रयुक्त होते हैं। क्या कभी किसी ने "बिन्ब्याहा पिता" या "सिंगल फादर" या "कामकाजी पिता " जैसा कुछ सुना हैं वहीं क्यों बिनब्याही माँ ,वर्किंग मदर आदि सुनते हुए हें अटपटा नहीं लगता ..अटपटा नहीं लगता क्योंकि आदत हो गई हैं...



आदत हो गई हैं महिलाओं के लिए ऐसे बर्ताव की भाषा की ,धारणाओं की ..फेमिनिस्म इन्ही आदतों को तोड़ने का प्रयास हैं ...यह प्रयास हैं अपनी पहचान और आत्मा सम्मान को पुनः परिभाषित करने के ,यह प्रयास हैं उन सभी बन्धनों को तोड़ने का जिन्होंने आज तक महिलाओं को उनकी इच्छा और सम्मान के विरूद्व जकड के रखा हैं ..फेमिनिस्म पुरुश्विरोधी नहीं हैं बल्कि एक प्रयास हैं ख़ुद को पहचानने का और उस पहचान को स्वीकृति दिलाने के ..फेमिनिस्म हैं औरत होने में गर्व महसूस करना ..नाकि यह गुनगुनाना की अगले जनम मोहे बिटिया न कीजो

9 comments:

  1. hi
    achcha laga aapko padhkar.

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  2. priyanka jee ,aaj hee aapkee do post padhi..itnaa to jaan gaya ki aap kaabil hain..haan rahee feminist hone na hone waalee bahas ....to is par aage bahas hogee...waise mujhe nishpakshtaa kee umeed to jaroor rahegee..

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  3. आपने सही लिखा है। निजी जीवन में एक भी बात के खिलाफ नहीं हूं मैं। आपकी पहली पोस्ट से ही जान गया था कि आपके भीतर बहुत ग़ुबार है, लेकिन इन प्रतिमानों पर नारी को खरा उतरने में कितना वक्त लगेगा आप भी नहीं जानतीं। सदियों से चला आ रहा ये नज़रिया रिवायत बन गया है। हमारे देश में तो महिलाओं का सर्वोच्च अधिकार "मतदान" भी नियंत्रित होता है। उसकी आज़ादी पर भी बाड़ लगा दी गई है। हमारे देश में नब्बे फीसदी से ज्यादा महिलाएं आज भी अपने पति या परिवार के मुखिया के इशारे पर वोट डालती हैं। मतदान के समय जिस बक्से में मतदाता की उंगली को कोई देख नहीं सकता वहां भी क्यों महिला की उंगली पूर्वनिर्देशित बटन पर ही दबती है। इसे बेड़ियो में खुद को बांधना कहेंगी या फिर वर्जनाओं को आत्मसात कर लेना।
    दूसरा मुद्दा है आरक्षण। शिक्षा या नौकरी में आरक्षण के खिलाफ नहीं हूं मैं। जिस सामाजिक ताने-बाने में बराबरी की बात होती है उसी में क्यों आरक्षण की दीवार खड़ी कर दी जाती है। बसों से लेकर ट्रेनों में महिलाओं के लिए आरक्षित सीटें और बोगियां हैं। (अक्षम यहां अपवाद हैं उनके लिए ये प्रावधान जरूरी है) क्यों इस अबला के ठप्पे वाले आरक्षण का विरोध नहीं होता? या आरामपरस्ती पर आकर सुधारकों के विचार भोथरे होने लगते हैं? आप भी दिल्ली की हैं, पिछले पांच साल से मैं भी दिल्ली में ही हूं। दिल्ली की बसों में देखा है कि युवतियां अपनी तो छोड़िये वरिष्ठ नागरिकों समेत अक्षम लोगों की सीटों पर कब्जा कर लेती हैं और उनके आने पर खाली नहीं करतीं। क्यों? दूसरे अधिकारों पर क्यों अपनी सीमाओं का विस्तार कर दिया जाता है? ये जागरुक और पढ़ी लिखी महिलाओं के व्यवहार की बात है।

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  4. मधुकर की बिल्कुल सहमत हूँ आप से ..मैं ख़ुद बसों इत्यादि में आरक्षित सीटों के पक्ष में कभी नहीं रही और आप विश्वास करें या नहीं पर आज तक कभी कोई आरक्षित सीट अपने लिए नहीं मांगी है। काफ़ी महिलाएं कहती हैं की क्या करें बस आदि का माहौल ही इतना ख़राब होता ,लोग खड़ा होने नहीं देते पर मैं इस से सहमत नहीं हूँ ..क्यों हम अपनी आवाज़ और जज्बा इतना बुलंद नहीं कर सकते की बदतमीजी का जवाब दे सकें ..बदतमीजी से डर कर सीट मांगती हैं तो बदसलूकी तो सीट पर बैठे हुए भी हो सकती है ...मैं सहमत हूँ की हम में से कईओं ने जो शहरों में रहती हैं शिक्षित हैं काम करती हैं पर जाने क्यों कमजोरी ,बेचारगी,अबला होने को जैसे अपनी बदी मान लिया है और कई महिलाएं अपने वास्तविक अधिकारों से अनभिज्ञ इन्ही बातों (सीट आदि के आरक्षण ) में अपने अधिकार ढूँढती हैं पर कारन जो भी है मैं इसकी पुरजोर विरोधी हूँ

    जहाँ तक बात पूर्वनिर्धारित वोट डालने की है तो मैं सिर्फ़ यह कहना चाहूंगी की कितनी महिलाएं हैं हमारे देश मैं जो राजनैतिक दृष्टि से शिक्षित है ?? कितनी है जो वोट का महत्व समझती हैं ?? देश की सबसे ज्यादा जनता गाँव में है और वहां रहने वाली महिलाएं तो घर की ड्योढी के बाहर पैर भी यदा कदा रखती हैं ,राजनैतिक ज्ञान या अपने मूल अधिकारों की कितने समझ की अपेक्षा रख सकते हैं हम उनसे ?? इस देश की ९०% औरतों के लिए रोज़मर्रा की जिंदगी में झेलने के लिए दमन के इतने रूप हैं कि मताधिकार जैसी बातों पर सोचने के लिए न तो समय है न शक्ति ॥ पहले अपने गर्भ में पलने वाली लड़की को तो बचा लें , पति कि मार से तो बच जायें , घूंघट से तो बाहर निकल पायें , स्कूल कॉलेज तो पहुँच पायें ,तिरस्कार से तो बच जायें , भेद भाव से तो निजात पायें ,कोई वस्तू न हो कर ख़ुद के इंसान होने का एहसास तो कर पायें ...फिर शायद मत भी अपनी मर्ज़ी से डालना सीख लेंगी ..एक जानवर भी बेडियाँ पसंद नहीं करता हम तो जीते जागते इंसान कि बात कर रहें हैं । और नारी को दमन को आत्मसात करने को दोषी मानने से पहले क्या उन्हें दोष देना जरुरी नहीं हैं जिन्होंने इस दमन को कभी नारी कि शोभा का नाम दे कर ,कभी समाज कि रीतियों को नाम दे कर या कभी उसके जीवन की जिम्मेदारियों का नाम दे कर उसके जीवन का हिस्सा बना दिया है ??

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  5. priyanka ji shaayad aapko meri tippani uchit nahin lagi. koi bat nahin. hame aapki post padhna pasand hai .

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  6. समाजशास्त्र का अध्ययन कभी किया नहीं आज आपकी पोस्ट को पढ़ते समय लगा कि शायद ऐसे ही पढ़ा जाता होगा. स्त्री विमर्श के फैशन से परे आपने बहुत बारीक तथ्यों को सहजता से उठाया है, जैसे आप लिखती हैं कि
    "विवाह करने का मतलब यह नहीं कि हमें उस उपनाम का त्याग करना हो जिस से हम २३-२४ साल तक जाने गए हैं , ज्यादा रोष तो मुझे तब होता जब कुछ परिवार अपनी पुत्रवधू का नाम तक बदल देते हैं .."
    "फेमिनिस्म का मतलब हैं कन्या भ्रूण हत्या के ख़िलाफ़ मोर्चा उठाना और हर लड़की को सिक्षा दिलाना ...नारीवाद प्रतिक है भाषा,कार्य,अधिकार हर रूप में पुरुषों के बराबरी कि जगह पाने कि ..नारीवाद का मतलब है दफ्तर में हमारे कार्य के लिए इज्ज़त से देखे जन बनिस्बत इस बात के कि हम क्या पहन कर आयें हैं या किसके साथ आयें हैं ..."
    लड़कियों कि तरह मत रो", "मर्द बन के दिखा",क्या औरतों कि तरह बातें बना रहा है" और ऐसा बहुत कुछ ..फेमिनिस्म का मतलब है न केवल भाषा में बल्कि आम जीवन में भी इन धारणाओं को तोड़ना है ..कुछ कहावतें और भी है जैसे जोरू का गुलाम इत्यादि ..देखने कि बात यह है कि समाज और उसकी भाषा कैसे दोनों ही महिलाओं के साथ भेद भाव करते हैं।"

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  7. इस लेख के ज़रिए फेमिनिज़्म के कॉन्सेप्ट को सही और सटीक तरीके से रखने के लिए शुक्रिया। सचमुच हर रोज़ लोगों को यही सबक समझाना पड़ता है। अब उन लोगों से यही कहूंगी की प्रियंका दी के ब्लॉग पर जाकर पढ़ों, सब समझ आ जाएगा :)
    लेकिन इस सबके बावजूद कभी कभी लगता है कि आवाज़ उठाकर सिर्फ फेमिनिस्ट होने की कैटेगिरी में हम आ जाते हैं लेकिन बदलता कुछ नहीं।

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  8. kahin kahin aap se virodhaabhas bhi ho sakta hai iske baavzood mera vot aapke saath hai.................

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  9. सहमत हूँ...अजय जी...
    प्रियंका जी...मैं तो बस इतना चाहूँगा की समाज में दोनो को बराबरी का दर्जा मिले...बाक़ी आपकी पोस्ट में दम है...बस डर एक बात का रहता है की कही इनके बीच हम गुम न हो जाए...मुझे तो ज़्यादातर पुरुष ही पीड़ित दिख रहे है मेरे आस पास...

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प्रियंका सिंह मान